
उत्तराखंड में शिकारी पक्षियों के संरक्षण की ऐतिहासिक पहल कॉर्बेट से नेपाल सीमा तक गिद्धों की उड़ान, सैटेलाइट टैगिंग से खुले नए रहस्य
उत्तराखंड में शिकारी पक्षियों के संरक्षण की ऐतिहासिक पहल
कॉर्बेट से नेपाल सीमा तक गिद्धों की उड़ान, सैटेलाइट टैगिंग से खुले नए रहस्य!
रामनगर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के साथ-साथ पूरे उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ा और वैज्ञानिक कदम उठाया गया है। उत्तराखंड वन विभाग ने प्रदेश में पाए जाने वाले शिकारी पक्षियों (रैपटर्स) के संरक्षण के लिए एक महत्वाकांक्षी दीर्घकालिक शोध परियोजना शुरू की है। इस परियोजना का उद्देश्य शिकारी पक्षियों की उड़ान, प्रवास, व्यवहार, रहन-सहन और उनके सामने आने वाले खतरों को समझकर भविष्य की संरक्षण रणनीतियों को और प्रभावी बनाना है।
उत्तराखंड को बर्ड डाइवर्सिटी के लिहाज से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में गिना जाता है। हालिया सर्वे में प्रदेश में अब तक शिकारी पक्षियों की 40 प्रजातियां रिकॉर्ड की गई हैं, जिनमें से 5 प्रजातियां थ्रेटन और 6 प्रजातियां नियर थ्रेटन श्रेणी में शामिल हैं। यह आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि इन पक्षियों का संरक्षण अब बेहद आवश्यक हो गया है।
पहले चरण में गिद्धों की सैटेलाइट टैगिंग
परियोजना के पहले चरण में वन विभाग द्वारा कुल 6 गिद्धों पर सैटेलाइट टैग लगाए गए थे। इनमें से 4 गिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और 2 गिद्ध राजाजी टाइगर रिजर्व से थे। इस शोध परियोजना में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) का तकनीकी सहयोग लिया जा रहा है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि उत्तराखंड शिकारी पक्षियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि पहले चरण का उद्देश्य यह समझना था कि ये पक्षी किन इलाकों में विचरण करते हैं, किन संसाधनों पर निर्भर रहते हैं और उनका एक्टिविटी पैटर्न कैसा है।
देहरादून से नेपाल बॉर्डर तक दर्ज हुआ मूवमेंट
डॉ. बडोला के अनुसार, पहले चरण की रिसर्च से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सैटेलाइट टैगिंग से यह स्पष्ट हुआ कि रैपटर्स का मूवमेंट बहुत बड़े क्षेत्र में होता है। देहरादून से लेकर नेपाल सीमा तक उनकी गतिविधियां दर्ज की गईं। इतना ही नहीं, कुछ पक्षियों का हाई एल्टीट्यूड क्षेत्रों तक जाना भी सामने आया, जो पहले ज्ञात नहीं था।
डंपिंग साइट्स बनीं खतरा, रिसर्च से बची जान
रिसर्च के दौरान यह भी पाया गया कि कुछ शिकारी पक्षी देहरादून–विकासनगर क्षेत्र की डंपिंग साइट्स के आसपास अधिक समय बिता रहे थे, जहां हाई टेंशन बिजली की तारों से दुर्घटना का खतरा बना रहता था। इस जानकारी के आधार पर वन विभाग ने विद्युत विभाग से समन्वय कर संबंधित तारों को इंसुलेट कराया। इसके बाद संकटग्रस्त प्रजातियों की मृत्यु दर शून्य हो गई, जिसे इस परियोजना की बड़ी सफलता माना जा रहा है।
दूसरे चरण में 12 रैपटर्स पर लगेगा सैटेलाइट टैग
अब परियोजना के दूसरे चरण में 12 शिकारी पक्षियों पर सैटेलाइट टैग लगाने की अनुमति मिल चुकी है। इस चरण में एक बार फिर पूरे प्रदेश में विस्तृत सर्वे किया जाएगा। इसमें पलाश फिश ईगल जैसी दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रजाति भी शामिल होगी। डॉ. बडोला ने बताया कि कुछ गिद्ध प्रजातियों की आबादी में 95 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है, जो बेहद चिंताजनक है।
इकोसिस्टम के प्रहरी हैं शिकारी पक्षी
पक्षी प्रेमी और विशेषज्ञ संजय छिम्वाल ने कहा कि शिकारी पक्षी इकोसिस्टम का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि केवल कॉर्बेट क्षेत्र में ही लगभग 49 प्रकार के शिकारी पक्षी पाए जाते हैं, जिनमें गिद्ध, चील, बाज और दुनिया का सबसे छोटा फाल्कन भी शामिल है। उनके अनुसार नियमित गणना और मॉनिटरिंग से ही यह पता लगाया जा सकता है कि किस प्रजाति की संख्या बढ़ रही है और किसकी घट रही है।
ऐतिहासिक पहल साबित होगी सैटेलाइट टैगिंग
प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने इस पहल को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि यह पहली बार है जब कॉर्बेट प्रशासन और वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर रैप्टर प्रजातियों पर इतनी गंभीरता से अध्ययन कर रहा है। उन्होंने बताया कि पलाश फिश ईगल की पूरी दुनिया में संख्या केवल करीब 2500 है और यह कॉर्बेट के ढिकाला क्षेत्र में रामगंगा नदी के आसपास पाई जाती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि सैटेलाइट टैगिंग से मिलने वाली जानकारियां इन दुर्लभ और संकटग्रस्त शिकारी पक्षियों के संरक्षण में मील का पत्थर साबित होंगी।



