2 Sep 2026, Wed

चीनी के दाम में लगातार उछाल, क्या इथेनॉल भी है वजह?

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चीनी के दाम में लगातार उछाल, क्या इथेनॉल भी है वजह?

 

एक महीने में करीब 14 रुपये किलो बढ़े दाम, उत्पादन में कमी और त्योहारों से पहले बढ़ी मांग बनी बड़ी वजह

 

नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। करीब एक महीने पहले जहां चीनी का भाव लगभग 48.50 रुपये प्रति किलोग्राम था, वहीं 21 अगस्त तक यह बढ़कर 62.45 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गया। त्योहारों के सीजन से पहले कीमतों में आई इस तेजी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

 

सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे कई कारण हैं। इनमें अनुमान से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम के कारण गन्ने की फसल को नुकसान, वैश्विक स्तर पर चीनी की सप्लाई में कमी तथा बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी जैसे कारक शामिल हैं।

 

एक महीने में लगातार बढ़े दाम

 

चीनी की साप्ताहिक कीमतों पर नजर डालें तो तेजी लगातार बनी हुई है।

 

– 24 जुलाई 2026: 48.50 रुपये प्रति किलो

– 31 जुलाई 2026: 51.99 रुपये प्रति किलो

– 7 अगस्त 2026: 55.48 रुपये प्रति किलो

– 14 अगस्त 2026: 58.97 रुपये प्रति किलो

– 21 अगस्त 2026: 62.45 रुपये प्रति किलो

 

यानी करीब एक महीने में चीनी के दाम में लगभग 14 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

 

उत्पादन का अनुमान घटा

 

वर्ष 2025-26 में पहले करीब 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया। हालांकि देश की सालाना खपत लगभग 260 से 280 लाख टन के बीच बताई जाती है, इसलिए सरकार का कहना है कि घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

 

सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है। साथ ही बड़े औद्योगिक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा भी तय की गई है।

 

बारिश और गन्ने की बीमारी का भी असर

 

चीनी उत्पादन में कमी के पीछे मौसम भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में पिछले साल सितंबर-अक्टूबर के दौरान हुई भारी बारिश ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया।

 

वहीं उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल पर गेरुआ रोग का असर पड़ा, जिससे उत्पादन प्रभावित होने की बात सामने आई है।

 

क्या इथेनॉल से बढ़े चीनी के दाम?

 

चीनी की कीमतों में तेजी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और चीनी के इस्तेमाल ने बाजार में उपलब्ध चीनी को कम कर दिया है?

 

सरकार ने इस दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। खाद्य सचिव के अनुसार 2022-23 में करीब 43 लाख टन चीनी इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की गई थी, जबकि 2025-26 में यह मात्रा लगभग 28 लाख टन रही।

 

सरकार का कहना है कि अब इथेनॉल उत्पादन में चीनी के मुकाबले अनाज, विशेष रूप से मक्के की भूमिका काफी बढ़ गई है। हालांकि आर्थिक नजरिए से देखें तो इथेनॉल उत्पादन मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत देता है और इससे चीनी उद्योग को अपने कारोबार में विविधता लाने में मदद मिलती है।

 

वैश्विक बाजार में भी बढ़ी कीमत

 

चीनी की कीमतों में तेजी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की सप्लाई प्रभावित हुई है।

 

30 जून को अंतरराष्ट्रीय चीनी की कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर करीब 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गई। यानी इस अवधि में 16 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।

 

ब्राजील और थाईलैंड जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में भी उत्पादन घटने की खबरों ने वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ाया है।

 

फिलहाल घबराकर खरीदारी की जरूरत नहीं

 

चीनी उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि देश में चीनी की तत्काल कमी नहीं है। अक्टूबर में नए पेराई सत्र की शुरुआत होने के बाद बाजार में नई चीनी की आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है।

 

इसलिए मौजूदा तेजी को केवल इथेनॉल से जोड़ना सही तस्वीर नहीं होगी। कम घरेलू उत्पादन, मौसम और फसल की बीमारी, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी और बाजार में सट्टेबाजी—इन सभी कारकों का संयुक्त असर चीनी की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

 

निष्कर्ष

 

चीनी के बढ़ते दाम के पीछे इथेनॉल एक कारक हो सकता है, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इसे कीमतों में मौजूदा उछाल की अकेली या मुख्य वजह मानना सही नहीं होगा। आने वाले महीनों में घरेलू उत्पादन, नए पेराई सत्र की शुरुआत और सरकार के आयात संबंधी फैसले यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि चीनी की कीमतें नीचे आती हैं या तेजी आगे भी जारी रहती है।

 

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