1 Sep 2026, Tue

कलेक्ट्रेट के बाहर सत्ता की ‘भक्ति’, उठ रहे सवाल

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कलेक्ट्रेट के बाहर सत्ता की ‘भक्ति’, उठ रहे सवाल

 

 

प्रतिबंध आम जनता के लिए या सत्ता पक्ष के लिए भी? कलेक्ट्रेट परिसर में भाजपा कार्यकर्ताओं के धरने और भजन-कीर्तन पर निष्पक्षता को लेकर सवाल

 

रुद्रपुर। जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में भाजपा कार्यकर्ताओं के धरने और घंटों चले भजन-कीर्तन ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और नियमों के समान रूप से पालन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने के मामले में एफआईआर की मांग को लेकर भाजपा कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर धरने पर बैठे रहे। इस दौरान भजन-कीर्तन भी किया गया।

 

सवाल यह है कि जिस कलेक्ट्रेट परिसर में धरना-प्रदर्शन को लेकर प्रशासन की ओर से प्रतिबंध और सुरक्षा संबंधी नियम लागू किए जाते हैं, वहां सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं को घंटों धरने की अनुमति कैसे मिली? आम जनता, किसान, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, भोजनमाता, आशा कार्यकर्ता या विपक्षी दल अपनी मांगों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचते हैं तो अक्सर बैरिकेडिंग और पुलिस बल के जरिए उन्हें नियंत्रित किया जाता है। ऐसे में सत्ता पक्ष के धरने को लेकर प्रशासन की कथित नरमी चर्चा का विषय बन गई है।

 

क्या नियम सभी के लिए समान हैं?

 

कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील प्रशासनिक परिसर की गरिमा और व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि परिसर में धरना-प्रदर्शन प्रतिबंधित है, तो यह प्रतिबंध सत्ता पक्ष समेत सभी पर समान रूप से लागू क्यों नहीं हुआ? क्या नियमों के पालन में राजनीतिक पहचान के आधार पर अंतर किया जा सकता है?

 

एकतरफा कार्रवाई पर भी सवाल

 

पूरे विवाद को लेकर सामने आए वीडियो में दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक और तनातनी दिखाई देने की बात कही जा रही है। ऐसे में यदि घटना में दोनों पक्ष शामिल थे, तो कानूनी कार्रवाई का आधार क्या रहा और कार्रवाई किस-किस के खिलाफ हुई, यह भी प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए। जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं या सत्ता से नजदीकी के आधार पर कार्रवाई का स्वरूप बदल जाता है।

 

प्रशासन की निष्पक्षता पर निगाहें

 

कलेक्ट्रेट जनता की समस्याओं और लोकतांत्रिक आवाज को सुनने का प्रमुख केंद्र है। ऐसे परिसर में किसी भी पक्ष को विशेष छूट मिलने की धारणा प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन पूरे मामले में तथ्यों को सार्वजनिक करे और स्पष्ट करे कि धरना-प्रदर्शन को लेकर लागू नियम सभी राजनीतिक दलों और आम नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं या नहीं।

 

सवाल कड़वे जरूर हैं, लेकिन लोकतंत्र में सवाल उठना जरूरी है। अब निगाहें प्रशासन के जवाब पर हैं कि कलेक्ट्रेट के नियम सत्ता और आम जनता—दोनों के लिए बराबर हैं या नहीं।

 

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